આજ નો દિવસ : વિક્રમ સંવત   ૨૦૭૩  ( નેમિસૂરિ સંવત  ૬૮ )  શ્રાવણ વદ અગિયારશ શુક્રવાર   Dt: 18-08-2017



મરનારની ચિતા પર ચાહનાર કોઈ ચડતું નથી, કહે છે હું મરી જઈશ પાછળથી કોઈ મરતું નથી, બળતા જોઈ એના દેહને એની આગમાં કોઈ પડતું નથી, અરે આગમાં તો શું એની રાખને કોઈ અડતું નથી…

                       जीवन प्रवाह

मन कि इच्छाओं को पूर्ण करने वाला कल्पवृक

हर फल या परिणाम किसी के फलस्वरूप ही उत्पन्न होता है। कर्म करेंगे तो फल नहीं मिलेंगा। कर्म की प्रेरणा विचार से ही उत्पन्न होती है और विचार का उद्गम है मन। कल्पवृक्ष भी तभी इच्छा पूरी करेगा जब मन में इच्छा उत्पन्न होगी।

एक थका हारा व्यक्ति जंगल में एक वृक्ष के नीचे सुस्ताने बैठा। उसे जोर से प्यास लगी थी, सोचा कि क्या ही अच्छा हो यदि पीने के लिए ठंडा-पानी मिल जाए। उसका ये सोचना था कि वहां फौरन एक लोटा ठंडा पाना पहुंच गया। उसने अपनी प्यास बुझई और आराम करने लगा। अब उसे भूख भी आई थी। उसने फिर सोचा कि क्या ही अच्छा हो यदि खाने के लिए स्वादिष्ट भोजन मिल जाए। उसका इतना सोचना था कि सामने खूब सारा स्वादिष्ट भोजन आ गया। उसके पेट भर भोजन किया। भोजन करने के बाद उसके मन में विचार आया कि इस निर्जन वन में मेरे सोचते ही पानी और खाना कहां से आया? कहीं ये भूत-प्रेत की माया तो नहीं?  यदि इस समय कोइ भूत आकर मुझे खा जाए तो?इस विचार से वह डर गया औऱ कांपने लगा। इसके इतना सोचना था कि सचमुच एक भूत वहां आ उपस्थित हुआ और बोला में तुम्हें खऊंगा।

वह व्यक्ति बहुत बुरी तरह डर गया औक सोचने लगा कि हो न हो इस वृक्ष को में कोइ जादू है जो मेरे मन के विचारों को जान लेता है और फिर वैसा ही हो जासा है। पहले उसने मुझे पानी दिया, फिर भोजन दिया और अब भूत के रूप में मृत्यु। अचानक उस व्यक्ति के मन में इसके विपरीत भाल आया और कहने लगा, लेकिन यह तो हो नहीं सकता। जरूर मैं कोई सपना देख रहा हूं। भूत-वूत नहीं होता औक मैं किसी भूत-वूत से नहीं जरता। उसका ये सोचना था कि भूत गायब।

वस्तुतः वह व्यक्ति एक कल्पवृक्ष के नीचे बैठा था। कहते हैं कि कल्पवक्ष सब इच्छाओं को पूरी करना वाला होता हैं। उसके नीचे बैठकर जो भाव मन में लाए जाएं अथवा इच्छा की जाए, वह अवश्य पूर्ण होती है। लेकिन किसी इच्छा के पूर्ण होने के लिए सहसे जरूरी चीज है कल्पवृक्ष भी नहीं दे सकता। कामने नहीं तो केसी कामनापूर्ति?

हर फल या परिणाम किसी कर्म के फलस्वरूप ही उत्पन्न होता है। कर्म नहीं करेंगै तो फल नहीं मिलेगा। कर्म प्रेरणा विचार से ही उत्पन्न होती है और विचार का उदगन है मन। कल्पवृक्ष भी तभी इच्छा पूरी करेगा जब मन में कोई इच्छा उत्पन्न होगी।

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसी इच्छी होगी वैसी ही परिणाम आएगा। भोजन और पानी की इच्छा हो तो भोजन-पानी और मृत्यु का सामना। हमारी सोच ही परिणाम है। हमारी सफलता-असफलता, सुख-दुःख, लाभ-हानि, आरोग्य-रूग्णता सब सोच द्वारा निश्चित होते हैं। सकारात्मक सोच का अच्छा परिणाम तथा नकारात्मक सोच का बुरा परिणाम।

सफलता, सुख, समृद्धि और आरोग्य हमारी सकारात्मक सोच या भावधारा का परिणाम है। असफलता, दुख, हानी और रूग्नता हमरी नकारात्मक सोच की परिणाम है। सफलता, सुख-समृद्धि, आय, स्वास्थय तथा के प्रति अविश्वास, संशय तथा भय ही इनकी प्राप्ति में प्रमुख बाधा हैं मनुष्य वास्तव में वही है जो इनकी सोच है। तभी वेदों में कामना  की गई है कि मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो – सन्में मनः शिव संकल्पस्तु!

मन तो संकल्प-विकल्प दोनों करता है। इसमें परस्पर विरोध भाव उत्पन्न होता रहते हैं। अच्छे विचार आचे हैं तो इसके विरोध विचार अर्थात अच्छे विचार भी अवश्य होते हैं। मन में उठना वाले विचारों पर नियंत्रण कर हम जीवन के मनचाहा आकार दे सकते हैं। जैसा भाव या विचार, वैसा ही जीवन।

यह पूरा ब्रह्माण्ड ही एक कल्पवृक्ष है जो हमारे भावों के अनुरूप हमारी सृष्टि का निर्माण करना है। हमारी आंतरिक औक बाह्य सृष्टि हमारे ही भावों द्वारा इसे सही आकार प्रदान किया जा सकता है तथा नियंक्षण द्वारा गलत आकार पाने से रोका जा सकता है।