આજ નો દિવસ : વિક્રમ સંવત   ૨૦૭૩  ( નેમિસૂરિ સંવત  ૬૮ )  શ્રાવણ વદ અગિયારશ શુક્રવાર   Dt: 18-08-2017



મરનારની ચિતા પર ચાહનાર કોઈ ચડતું નથી, કહે છે હું મરી જઈશ પાછળથી કોઈ મરતું નથી, બળતા જોઈ એના દેહને એની આગમાં કોઈ પડતું નથી, અરે આગમાં તો શું એની રાખને કોઈ અડતું નથી…

                   

 

                  पांव पवित्र कैसे होते है?

- आचार्य विजय नित्यानंद सूरि

योगीओं का कहना है-यों तो पांवशरीर में सबसे नीचे अंग है, अधमांग है। किन्तु यदी इन पांवों से परोपकार, लोकोपकार, साधना, तपस्या औऱ तीर्थयात्रा जैसे शुभ कार्य किये जायें तो ये पैर मनुष्य के हृदय और मस्तक से भी श्रष्ठ हो सकते है।

 हम भगवान के चरण-कमल का पूजा करते हैं। उनके चरणों का स्पर्श करके जीवन के कृतीर्थ मानते हैं। गुरूओं के चरणों में मस्तक झुकाते हैं। माता-पिता के चरणों में झककर नमस्कार करते हैं, क्यों?उनके चरण हमारे मस्तक से भी श्रेष्ठ क्यों हो गये?क्यों उन महापुरूषो ने इन चरणों में भी वह शक्ति आ गई है कि इनका स्पर्श करने पर प्राणियों के कष्ट दूर हो जाते हैं। जब घर्षण करते-करते पत्थर में चुम्बक का गुण जाता है। उसमें आकर्षण शक्ति पैदा हो जाती है। तांबे के तारों वे जब बिजली का करेंट प्रवाहित होने लगता है तो वह तार शक्ति के स्रोत बन जाता हैं। इसी प्रकार पांवों में जब भक्ति की, तप की, ध्यान की, साधना की और परोपकार की ऊर्जा प्रवाहित है तो यै पांर भी स्वयं शक्तिपुंज बन जाते हैं। ये अमृत रसायण बन जाते हैं।

जो व्यक्ति भयंकर जानलेवा बीमारीयों से मनणासन्न हो गया है। जिसके जीव की आशा छूट गई है वह व्यक्ति भी जब भक्ति औक श्रद्धा से भरकर आपकी चरण-रज के शरीर पर रगड लेता है तो उसके समस्त रोग दूर हो जाते हैं, उनका शरीर कामदेव के समान सुंदर औक निरोगी हो जाता है। यह चमत्कार है भगवान की चरण-रज का।

भगवद् चरणों की बात चल रही है तो मुझे एक संस्कृत भक्त कवि की उक्ति याद आ रही है। उस श्लोक का भाव आपको बताता हूं-

भक्त कहता है – प्रभु आपके चरण-कमल सदा मेरे हृदय पर टिके रही, मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करो, यदि यह प्रार्थना स्वीकार नहीं है तो दूसरा वरदान यह  दो आपके चरणों में सदा मेरा हृदय रमा रहे। बात यह है की चाहे भगवान के चरण हमारा मन भगवान के चरणों में रहें हम तो दिन उन चरणों के पास ही रहें।

रामायण का प्रसंग आपने सुना ही होगा जब भगवान नदी पार करने के लिए केवट के नाव में बैठना चाहते हैं तो भक्त केवट कहता है – भगवन्! पहले मुझे आपके चरण धो लेने दीजीए।

राम पूछतें हैं – भाई क्यों? ऐसा गंदगी है हमारे पांवो में?

केवट कहता है – भगवन! मैंने सुना है, आपके चरणों का स्पर्श होने पर पत्थर बनी हुई अहल्या वापस जीवित नारी बन गई। कहीं मेरी यह लकडी की नेर भी आपके चपण स्पर्श से औरत बन गई तो फिर मैं अपनी रोजी-रोटी कैसे कमाउंगा?

भगवान इस भक्ति पर हस पडे। कितनी चतुरता से उसने भगवान का चरणोदक लेने की बात कही है।

तो चरणो का पवित्रता के संबंध में हम बात कर रहा थे। संसार भगवान के ‘चरण’ अपने मस्चक पर, हृदय पर रखना है, क्योंकि वे तपःपूत होता है। उन साधना में विद्युत शक्ति प्रवाहित हीता है। उन चरणों में पैदल चलकर भगवान ने लाखों प्राणियों का कल्याण किया है।

पांवों की पवित्रता, तप-साधना से बढती है। दूसरी बात है, जो पांव संसार के परोपकार के लिए, जनकल्याण के लिए निरन्तर हैं वे चरण भी पूजनिय वंदनिय हैं।

जैन परम्परा में तीर्थंकर संसार के सर्वोत्तम महापुरुष होते हैं। तीर्थंकर पद प्राप्त करने के बाद वे एक प्रकार से कृतकृत्य हो जाते हैं। उनके लिए कोई काम करना शेष नहीं रहता। क्योंकि चार घातिकर्मो का नाश कर चुके हैं और अब इस देह को त्यागकर मोक्ष में जाना निश्चित है परंतु फिर भी वे कहीं एक स्थान पर स्थिर होकर बैठते हैं क्या?नहीं! उनका उदघोष होता है विहार चरिया इसिणं पसत्थ ऋषी महर्षियों के लिए विहार करना, चलता रहना ही श्रेष्ठ हैं गामाणुगामं दूइज्जमाणे एक गांव से दूसरे गांव एक नगर में से दूसरे नगर नदी की तरह बहते रहना, चलता रहना, यही उनका व्रत संकल्प होता है। उनका घोष होता है चरैवेति चरैवेति-चलते रहो, चलते रहो।

तथावत बुद्ध अपने शिष्यों से कहते हैं – भिक्षुओं!संसार के हित और कल्याण के लिए चलता रहो, रलचे रहो।

भगवान महावीर ने सिंधु देश के राजा उदायन को सदबोध देने के लिए बिहार की भूमि से पैदल चलकर यात्रा की। भयंकर गर्मी के मौसम में 700 कोस के उग्र विहार किया-किसलिए?उन अनार्थ, असंस्कृत, अज्ञान लोगों में ज्ञान में करूणा की लहर पैदा करने के लिए?तो महापुरूषो की पदयात्राएं परोपकार के लिए होती है। कवि कहता है-

संत – सुरसरी परसराम चलै भुजंगी चाल।

जित-जित सेरी संचरे तित करे निहाल।

महापुरुषो गंगा की धारा की तरह निरंतर चलते वहता हैं। जिस भूमि पर गंगा की धारा पहुंच जाती है वहां की भूमि सोना उगलने लगती है। इसी प्रकार जिस क्षैत्र में संतजनों के चरण टिक जाते हैं वह क्षेत्र भी पवित्र हो जाता है।