આજ નો દિવસ : વિક્રમ સંવત   ૨૦૭૩  ( નેમિસૂરિ સંવત  ૬૮ )  અષાઢ સુદ પાંચમ બુધવાર   Dt: 28-06-2017



અમાવસ્યા કિસ માસ ન મેં નહીં આતી, થકાવટ કિસ રાત મેં નહીં આતી, ઈસ સંસાર મેં કોઈ બતાઓ તો સહી, સમસ્યા કિસ રાહ મેં નહીં આતી…

विनय का स्वरूप और महत्व|

-    वल्लभ उवाच

आभ्यन्तर तप का दूसरा भेद विनय है। निवय जीवनरूपी सोने का साथ हुए अभिमान, कठोरता, मद, दर्प, अहंकार, अश्रद्धा, धृणा आदि दुर्गुणों के कणों को तपा कर निकाल दाता है और जीवनरूपी स्वर्ग शुद्ध औऱ लचीला बना दाता है कि उसके द्वारा अनेक सद् गुणरूपी आभूषण बनाए जा सकते है। यह निश्चित है कि जब सोना नरम नहीं होता, तब तक उसमें नग भी नहीं जडा जा सकता। सद् गुणो के नग जडने के लिए जीवनरूपी स्वर्ण को नरम बनाना होगा। एक तरह से देखा जाय तो विनय सभी गुणों का मूल है। विनयरूपी मूल न हो तो धर्मरूपी वृक्ष फलेगा-फूलेगा नहीं, वह सूखा ठूंठ बनकर खडा रह जायगा।

जिसका हृदय पत्थर-सा कठोर होगा, वहां ज्ञान प्रविष्ट नहीं हो सकेगा। ज्ञान के प्रवेश के लिए हृदय का भूमि पर उगे अहंकार के कंटीले झाड-झंखाड, अभिमान के कंकर और मद के पत्थरों को उखाड कर साफ करना होगा और उसे नम्र ल समतल बनानी होगी। आजकल के विद्यार्थीयों के दिमाग पर भले ही पूस्तकें लदी हुई हों, विशाल कोलेज हो और विशाल पुस्तकालय हो, लेकिन उनमें वास्तविक ज्ञान की कमी है। उनमें ज्ञान की गहराई नहीं है। ऊपर सा पूस्तकीय ज्ञान ठूंसा जाता है, जो उसके अभिमान को भी देखा जाता है। आजकल के विद्यार्थीवर्ग में किसी भी वस्तु का तह में पहुंचने का साहस नहीं है। इसके कारणों को ढूंढने पर पता लगेगा कि विद्यार्थीवर्ग में विनय की कमी ज्ञान को भीतर नहीं पहुंचने देती।

नदीसूत्र में अक्खड श्रोता को मुद्गशैल पत्थर का उपमा दी है। जैसे मुदगशैल पाषाण पर चाहे जितनी मूसलाधार वर्षा हो, वहां एक बूंद भी टिकेगा नहीं, सारा पानी बहकर चला जायेगा। इसी प्रकार जिसके हृदयरूपी धपातल चट्टानें पडी हैं, उन पर ज्ञान की कितनी ही मूसलाधार वर्षा की जाय, वह चेकागा नहीं, वह उस ज्ञान को ग्रहण ही नहीं करेंगी।

यदी मन का घडा पहले ही अहंकार, मद और मत्सर के पत्थरों सा भरा है तो उसमें ज्ञान का अमृत कैसे भरा जायेगा?अगर उसमें जबरर्दस्ती ज्ञान का अमृत उडेला जायेगा तो वह टिकेगा नहीं, वह जायेगा, उलटे, उस ज्ञानलव को पाकर उसका अभिमान और बढ जायेगा। ‘अधजल गगरी छलका जाय’ इस कहावत के अनुसार अधकचरा ज्ञान उसके अहंकार को फुलाने में और निर्मित बनेगा।

कुंए में घडा डाला, परन्तु जब तक वह झकेगा नहीं, तब तक पानी से भर नहीं सकता। घडा स्वयं पानी में है, उसके चारों ओर पानी ही पानी है, लेकिन वह खाली का खाली रहा, क्येंकि वह नीचे झुका नहीं। जीवन का घड भी ज्ञान के जल से भरना हो तो उला झकना होगा। यदि झुकना नहीं सीखी है तो चाहं किसी ज्ञान के महासमुद्र संत ऋषि-मुनि के पास चले जाएं या विशेषज्ञ के पास चला जाए आप कोरे के कोरे रहेंगे। यह निश्चित तौर पर जान लें कि आप में ज्ञानरूपी जल का प्रवेश नहीं हो सकेगा।