આજ નો દિવસ : વિક્રમ સંવત   ૨૦૭૩  ( નેમિસૂરિ સંવત  ૬૮ )  શ્રાવણ વદ અગિયારશ શુક્રવાર   Dt: 18-08-2017



મરનારની ચિતા પર ચાહનાર કોઈ ચડતું નથી, કહે છે હું મરી જઈશ પાછળથી કોઈ મરતું નથી, બળતા જોઈ એના દેહને એની આગમાં કોઈ પડતું નથી, અરે આગમાં તો શું એની રાખને કોઈ અડતું નથી…

शील का व्यापक रुप

वल्लभ उवाच

भारतीय दर्शनों में शरीर को आत्मा के मंदिर माना है। आत्मा देवता है, शरीर उसका मंदिर है।

शील आत्मा का सौंदर्य है। वर्तमान युग में शरीर के सुन्दर बनाने की और मनुष्य जितना ध्यान दे रहा है, उतना ध्यान संभल है, पहले कभी नहीं दिया गया होगा। यदि हिसाब लगा कर देखें तो देश के लाखों-करोडों रुपये शरीर को सन्दर बनाने में प्रतिमास खर्च हो रहे हैं। साथ ही अपना अमूल्य समय भी इसके पीछे बर्बाद हो रहा है। दूसरी ओर आत्मा के सुन्दर बनाने से ध्यान हट रहा है। बाह्य टापटीप, फैशनबल कपडे, लिपस्टिक, हेयर ओइल, सेंट, पाउडर, स्नो और क्रीम की लिपाई-पुताई, केश- विन्यास और श्रृंगार प्रसाधनों द्वारा आकर्षक साजसज्जा से युक्त चहेरा बनाने या शरीर को सजाने-संवारने में ही अहिकतर ध्यान केन्द्रित हो और उस शरीर में विराजमान आत्मा को सजाने- संवारने की और बिलकुल ही उपेक्षा हो, बल्कि उससे विलासिता, इन्द्रियविषयासक्ति, अश्लिल सिनेमा जैसे कुद्दश्यप्रेक्षण, घासलेटी साहित्य के पठन-पाठन या कामोत्तेजक एवं मादक चीजों के सेवन करके, गंदे, विचारों और गंदे आचारों, सहशिक्षा, हस्तमैथुन, अप्रकृतिक व्यभिचार आदि के द्वारा आत्मा पर कालिमा पोती जा रही हो, तब कहा जायोगा कि मन्दिर की खूल लिपाई-पोताई हो रही है, उस पर सोने-चांदी के कलश चढाए है, उस तरफ सर्वथा ध्यान नहीं है। अन्दर का वह देवता-आत्मा-वास्तविक साजसज्जा या चमक-दमक से शून्य हो रहा है। भारतीय दर्शनों में शरीर को आत्मा का मंदिर है। वह ठीक है कि शरीररुपी मंदिर की भी सारसंभाल इस मंदिर की ही हो रही है, आत्मादेवता की सारसंभाल प्रायः नहीं हो रही है। आत्मादेवता की पूजा के बदले आज शरीर पूजा ही अधिक हो रही है।

हां, तो मेरे कहने का मतलब है – आत्मादेवता की पूजा औक सौंदर्य-प्रसाधन शील-पालन से होता है। उस ओर ध्यान दैना बहुत ही जरूरी है। यानी आज शरीर-सत्कार, श्रृंगार या शरीर की सजावट के रूर में आत्मे की द्रव्यपूजा का अपेक्षा उसकी भावपूजा की अत्यधिक आवश्यकता है। एक व्यक्ति प्रतिमास करोडों गायों का दान देता है, दूसरा बाह्य-पदार्थ बिलकुल न देता हुआ भी शील, संयम का पालन करना है तो तीर्थंकर प्रभु की दृष्टि में दान-दाता के अपेक्षा शील-पालक बढकर है।

एकव्यक्तिकरोडोंस्वर्णमुद्राएंसुपात्रकोदानमेंदेताहै, दूसरासोनेऔररत्नोंसेजडाहुआतीर्थंकर- प्रभुकेमंदिकबनवाताहै, इनदोनोंकाअपेक्षाशुद्धमुसेशील(ब्रह्मचर्य) पालनकरनेवालाबढकरहै, औरउसकाफलभीपूर्वोक्तदोनोंकार्योंकीअपेक्षाअधिकहै। क्योंकिसुपात्रकोदानदेनायाप्रभुकामंदिरबनानातोद्रव्य-पूजनहै, जबकीशील(ब्रह्मचर्य) भावपूर्वकहै। द्रव्य-पूजाकीअपेक्षाभावपूजाकेस्थानबहुतऊंचाहै। वास्तवमेंभगवानकीआज्ञाओंयासंदेशोंकापालनकरनाहीउनकीश्रेष्ठपूजाहै। आचार्यहेमचन्द्रनेयहीतोकहाहै-

‘वीतराग!तव सपर्यास्तवाज्ञापरिपालनम्।’

‘हे वितराग देव! आप की सर्वश्रेष्ठ पूजा या सेवा आपके आदेशों, संदेशों या कदमों पर चलना है।’

निष्कर्ष यह निकला कि शील-पालन करना भगवान की आज्ञा है और उनका आज्ञाराधने करना ही उनकी सेवा या श्रेष्ठ पूजा है।