આજ નો દિવસ : વિક્રમ સંવત   ૨૦૭૩  ( નેમિસૂરિ સંવત  ૬૮ )  અષાઢ સુદ પાંચમ બુધવાર   Dt: 28-06-2017



અમાવસ્યા કિસ માસ ન મેં નહીં આતી, થકાવટ કિસ રાત મેં નહીં આતી, ઈસ સંસાર મેં કોઈ બતાઓ તો સહી, સમસ્યા કિસ રાહ મેં નહીં આતી…

                                                

 

                                                     सुखी जीवन का रहस्य

-          नयन सागदजी मुनिराज

वस्तुतः धन, वैभव, पद, प्रतिष्ठा आदि जितने भी बाह्य संयोग हैं वे सभी अशाश्वत हैं, क्षण-क्षयी। उन पर अहंकार करना हमारी अज्ञानता है, संयोग शाश्वत नहीं तो गुमान भी कितने दिन का। संयोगो पर अहंकार  करने की अपाक्षा उन्हें क्षणिक जानवर आत्मा के शाश्वत स्वरूप क ध्यान करना चाहिए। संयोगों पर अभिमान करना वैसा ही है, जैसे-एक बार एक कागज को अभिमान हो गया। हवा का सहारा पाकर पर्वत के शिखर पर पहुंचे हुए एक गंदै से कागज के टुकडे ने अत्यंत असभ्यतापूर्वक शिखर से कहा देख ली, मेरी ताकत, यहां तक पहुंचने की।

यह गलतफहमी अपने दिमाग से निकाल दो कि यह ताकत तुम्हारी है।

मेरी नहीं तो औक किसकी है, तुम्हें यहां तक पहुंचाने का संपूर्ण श्रेय हवा के जाता है वरना तुम तो कितने तुच्छ हो करजोर हो यह मैं अच्छी तरह जानता हूं। यह हवा बीच में कहां सा आ गई। यह बात है तो एक काम करो यदि तुम्हें ऐसा लगता है कि तुं अपनी ताकत से यहां तक पहुंचे हो तो अब तुम यहीं रह जाओ नीचे जाना ही मत।

शिखर कागज को यह सलाह दे रहा था तभी वहां हवा का एक जोरदार झोंका आया कागज शिखर के कुछ जवाब दै सके उसके पहले ही शिखर से उडा औक कुछ ही क्षण में जमीन पर बहूत गंदी गटर में जा गिरा। देखते ही देखते उसके टुकडे-टुकडे हो गए।

ऐसे ही आदमी हवा जैसे अनुकूल पुण्य कर्मो के सहारा पाकर धनवान बनने में एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने में सफल बन जाए इसमें कोई आश्चर्य नहीं।

परंतु हला जैसे कर्म जो अपना रूख बदलते हैं प्रतिकूल पाप कर्म उदित होते हैं धडके से दरिद्रता के गर्त में डूब जाता है। यह धडाके से दरिद्रता के गर्त में डूब जाता है। यह बात हेमशा याद बात हमेशा याद रहनी चाहिए कि पुण्य कर्म की हवा का एक झोंका हमें सफलता के शिखर पर पहुंचा सकता है। अतः अनावश्यक अभिमान का कोई अर्थ नहीं।

थक जायेंगे पांव चलते-चलते, बुझ जाएगा दीप जलते-जलते कागज की नाव में बैठकर अभिमान मत करो, कब तेरी नाव मिट जाये।

चार दिनों की सुखद चांदनी फिर अंधियारी आवें। अतः जो मिला है वह सदा रहे निश्चित नहीं इसलिए इसका सदुपयोग करो और जो खोया है वह कल मिल भी सकता है उसका गम मत करो।

जीवन में सुख-दुःख आते हैं तो उसे घटना मानो परमात्मा के प्रसाद मानों दोनों में अंतर की समता को बनाए रखो अनुकूलता-प्रतिकूलता तुम्हारे हाथ में नहीं है वह तकदीर के हाथ में है पर प्रसन्नता बनाए रखना हाथ में है। इस दृष्टि को अंदर विकसित करने की कोशिश करो।

जिस प्रकार ऋतुओं में बसंत और पतझड दोनों आते हैं, आकाश में सूर्य का उदय औऱ अस्त दोनों होते हैं, शरीर में युवावस्था व वृद्धावस्था दोनों आती हैं, धंधे में लाभ-हानि दोनों होते हैं तथा जिवन में सुख-दुःख दोनों होते हैं। किसी भाव को स्थायी मान लेना उचित नहीं है।

जीवन के अनुभव तो बादल जैसे और जाते हैं। सुख-दुःख के इन अल्पकालिक अनुभवों से जरा भी विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। कष्टों की भरमार के बाद भी विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। कष्टों की भरमां के बाद भी जीवन जीने लायक है क्योंकि जीवन अनीतकाल के बाद मिला। यह जीवन-मृत्यु में बदल डालने की प्रचंड शक्ति रखना है।