આજ નો દિવસ : વિક્રમ સંવત   ૨૦૭૪  ( નેમિસૂરિ સંવત  ૬૯ )  કારતક સુદ ત્રીજ રવિવાર   Dt: 22-10-2017



વિધીની સાથે વેર ન થાય, જીવન આખું ઝેર ન થાય, નસીબ છાપેલો કાગળ છે, તેમાં કદી ફેર ન થાય…

असत्य बोलने से वसुराजा की दुर्गति

 

चेदी देश में शुक्तिमती नदी के किनारे उस की क्रीड़ासखी की तरह शुक्तिमती नगरी बसी हुई थी । वहां अपने तेज से अद्भुत माणिक्य-रत्न के समान, पृथ्वी के मुकुट के तुल्य अभिचन्द्र राजा राज्य करता था । पाण्डुराजा के यहां जैसे सत्यवादी युधिष्ठिर पैदा हुए थे, वैसे ही राजा अभिचन्द्र के यहां सत्यवादी वसु का जन्म हुआ । किशोर-अवस्था होते ही वसुराजकुमार को क्षीरकदम्बक गुरु के पास पढने भेजा । उस समय क्षीरकदम्बक उपाध्याय के पास उनका पुत्र पर्वत, राजपुत्र वसु और विद्यार्थी नारद ये तीनों साथ-साथ अध्ययन करते थे । एक बार ये तीनों विद्यार्थी अध्ययन के परिश्रम के कारण थक कर मकान की छत पर सो गए । उस समय आकाश में उड़ कर जाते हुए जंघाचारी मुनियों ने इन्हें देख कर परस्पर कहा - "इन तीनों में से एक स्वर्ग में जायेगा और दो नरक में जायेंगे ।" क्षीरकदम्बक उपाध्याय ने यह वार्तालाप सुना और वे गहरी चिन्ता में डूब गए । उन्हें खेद हुआ कि मैं इनका अध्यापक और मेरे पढ़ाए हुए विद्यार्थी नरक में जाएं ! जैसी भवितव्यता ! फिर भी मुझे यह तो पता लगा लेना चाहिए कि इनमें से कौन स्वर्ग में जाएगा और कौन नरक में जाएंगे ?" अतः उन्होंने अपनी सुझबुझ से कुछ विद्या और युक्ति से लाक्षारस से परिपूर्ण आटे के तीन मुर्गे बनाए । एक दिन तीनों विद्यार्थियों को अपने पास बुलाया और प्रत्येक को एक-एक र्मु्गा देते हुए कहा - "इसे ले जाओ और इसका वध ऐसी जगह ले जा कर करना, वहाँ कोई न देखता हो ।"

वसु और पर्वत दोनों अपने-अपने मुर्गे को लेकर नगरी के बाहर अलग-अलग दिशा में ऐसे एकान्त स्थान में पहुंचे, जहाँ मनुष्यों का  आवागमन बिलकुल नहीं होता था । अतः उन्होंने यह सोच कर कि यहाँ कोई देखता नहीं है, अपने-अपने मुर्गे को खत्म कर लिया । महात्मा नारद अपने मुर्गे को लेकर एकान्त जनशून्य प्रदेश में पहुंचा, लेकिन वहां अपने इधर-उधर देख कर सोचा कि गुरुजी ने आज्ञा दी है कि "जहाँ कोई न देखे वहां इसे मार कर लाना ।" यहाँ तो यह मूर्गा मुझे देख रहा है, मैं इसे देख रहा हूं, आकाशचारी पक्षी वगैरे देख रहे है, लोकपाल देखते है, और कोई नहीं देखता है तो भी ज्ञानी तो देखते ही होंगे  उनसे तो अंधेरी से अंधेरी जगह में भी गुप्तरुप से की हुई कोई भी बात छिपी नहीं रहती । अतः में इस मुर्गे का वध किसी भी जगह नहीं कर सकता,  तब फिर गुरुजी की आज्ञा का पालन कैसे होगा ?" यों चिन्तनसागर में गोते लगाते-लगाते नारद का एकाएक ज्ञान का प्रकाश हुआ, हो न हो, हिंसापराड़मुख दयालु गुरुजी ने हमारी परीक्षा के लिए मुर्गा दिया है । मारना चाहते तो वे स्वयं मार सकते थे । हम तीनों को एक-एक मुर्गा देकर मार लाने की आज्ञा दी है, उसके पीछे, गुरुजी का आशय हमारी अहिंसाबुद्धि की परीक्षा लेने का है । उनकी आज्ञा का तात्पर्य यही है – "मुर्गे का वध न करना।" मैं इसे नहीं मारुंगा । ये निश्चय करके नारद मुर्गे को मारे बिना ही गुरुजी के पास लेकर आया और गुरुजी से मुर्गा न मार शकने का कारण निवेदन किया । गुरुजी ने मन ही मन निश्चय किया कि यह अवश्य ही स्वर्ग में जाएगा और नारद को स्नेहपूर्वक छाती से लगाया एवं ये उद्गार निकाले - अच्छा, अच्छा, बहुत अच्छा किया बेटे !"

कुछ ही देर बाद वसु और पर्वत भी आ गए । उन्होंने कहा – "लीजिए गुरुजी ! हमने आपकी आज्ञा का पालन कर दिया । जहाँ कोई नहीं देखता था, उसी जगह ले जा कर अपने-अपने मुर्गे को मार कर लाये है । गुरु ने उपालभ्भ के स्वर में कहा - 'पापात्माओ ! तुमने मेरी आज्ञा पर ठीक तरह से विचार नहीं किया । जिस समय तुमने मुर्गे को मारा, क्या उस समय तुम उसे नहीं देखते थे ? या वह तुम्हें नहीं देख रहा था ? क्या आकाशचारी पक्षी आदि खेचर नहीं देखते थे ?" खैर, तुम अयोग्य हो । क्षीरकदम्बक ने निश्चय किया कि ये दोनों नरकगामी प्रतीत होते है । तथा उनके प्रति उदासीन हो कर उन दोनों (को अध्ययन कराने की रुचि खत्म हो गई ।) विचार करने लगे – वसु और पर्वत और को पढ़ाने का श्रम व्यर्थ गया । सच्चे गुरु का उपदेश पात्र के अनुसार फलित होता है । बादलों का पानी स्थानभेद के कारण ही सीप के मुँह में पड़ कर मोती बन जाता है,  और वहीं सांप के मुंह में पड़ कर जहर बन जाता है, या उपर भूमि या खारी जमीन पर या समुद्र में पड़ कर खारा बन जाता है । अफसोस है, मेरा प्रिय पुत्र और पुत्र से बढ़कर प्रिय शिष्य वसु दोनों नरक में जायेंगे । अतः ऐसे गृहस्थाश्रम में रहने से क्या लाभ ? इस प्रकार विचार करते-करते क्षीरकदम्बक उपाध्याय की संसार से विरक्त हो गई । उन्होंने तीव्र वैराग्यपूर्वक गुरु से दीक्षा ले ली ।

अब उनका स्थान उनके व्याख्याविचक्षण पुत्र पर्वत ने ले लिया । गुरु-कृपा से सर्वशास्त्रविशारद बन कर शरदऋतु के मेघ के समान निर्मलबुद्धि से युक्त नारद अपनी जन्मभूमि में चले गए । राजाओं में चन्द्र समान अभिचन्द्र राजा ने भी उचित समय पर मुनिदीक्षा ग्रहण कर ली । उनकी राजगद्दी पर वसुदेव के समान वसुराजा विराजमान हुए ।  वसुराजा इस भूतल पर सत्यवादी के रुप में प्रसिद्ध हो गया । वसुराजा अपनी इस प्रसिद्धि की सुरक्षा के लिए सत्य ही बोलता था । एक दिन कोई शिकारी शिकार खेलने के लिए विन्ध्यपर्वत पर गया । उसने एक हिरन को लक्ष्य करके तीर छोड़ा; किन्तु दुर्भाग्य से वह तीर बीच में ही रुक कर गिर पड़ा । तीर के बीच में ही गिर जाने का कारण ढूंढने के लिए वह घटनास्थल पर पहुंचा । हाथ से स्पर्श करते ही उसे मालूम में भूमि की छाया पति-विम्बित होती है, इसी तरह इस शिला के दूसरी और प्रतिबिन्धित हिरण को मैंने कहा देखा है ।" हाथ से स्पर्श किये बिना किसी प्रकार जाना नहीं जा सकता । अतः यह शिला अवश्य ही वसु राजा के योग्य है ।" यो सोच कर शिकारी ने चुपचाप वह शिला उठाई और वसुराजा के पास पहुंच कर उन्हें भेंट देते हुए शिला प्राप्त होने का सारा हाल सुनाया ।

राजा बसु सुन कर और गोर से शिला को क्षण भर देख कर बहुत खुश हुआ । उस शिकारी  को उसने बहुत-सा इनाम दे कर विदा किया । राजा ने उस शिला की गुप्तरुप से राजसभा में बैठने योग्य एक वेदिका बनाई और वेदिका बनाने वाले कारीगर को मार दिया ।" सच है राजा कभी किसी के नहीं होते । "वेदिका पर राजा ने एक सिंहासन स्थापित कराया । इनके रहस्य से अनभिज्ञ  लोग यह समझने लगे कि सत्य के प्रभाव से वसु राजा का सिंहासन अधर रहता  है । सत्य से प्रसन्न हो कर देवता भी इस राजा की सेवा में रहते है ।" इस प्रकार वसु राजा की उज्जवल कीर्ति प्रत्येक दिशा में फैल गई । । उस प्रसिद्धि के कारण भयभीत बने हुए अन्य राजा वसुनुष के अधीन हो गए । "प्रसिद्धि सच्ची हो या झूठी , राजाओं को विजय दिलाती है ।"

एक दिन नारद पर्वत को आश्रम में मिलने आया । तब उसने बुद्धिशाली पर्वत को अपने शिष्यों को ऋग्वेद की व्याख्या पढ़ाते हुए देखा । उस समय "अजैर्यष्टव्यम्"सूत्र आया तो उसकी व्याख्या करते हुए 'अज'  शब्द का अर्थ समझाया- "बकरा ।" यह सुनकर नारद ने  पर्वत से कहा – "बन्धुवर! इस अर्थ के कहने में तुम्हारी कहीं भूल हो रही है । तुमने भान्तिवश अज का बकरा अर्थ किया है, जो नहीं होता है । अज का वास्तविक अर्थ होता है –'तीन साल का पुराना धान्य, जो ऊगा न सको हमारे गुरुदेव ने भी आज का अर्थ धान्य ही किया था । क्या तुम उसे भूल गये ?" उस समय प्रतिवाद करते हुए पर्वत ने कहा – 'तुम जो अर्थ बता रहे हो, वह अर्थ पिताजी ने नहीं किया था । उन्होंने 'अज' शब्द का अर्थ बकरा ही किया था, और कोष में भी यहीं अर्थ मिलता है ।' तब नारद ने कहा – 'भाई ! किसी भी शब्द के गौण और मुख्य दो अर्थ होते है । गुरुजी ने हमें 'अज'  शब्द के विषय में गौण अर्थ कहा था । गुरुजी धर्मसम्मत उपदेश देेने वाले थे । श्रुति भी धर्मस्वरुपा ही है । इसलिए मित्र ! श्रुतिसम्मत और गुरुपदिष्ट दोनों अर्थो के विपरीत बोल कर तुम क्यों पाप-उपांजन कर रहे हो ?' अभिभानयुक्त मिथ्यावाणी मनुष्यवाणी  मनुष्य को दण्ड या भय देने वाली नहीं
होती । अतः पर्वत ने कहा – "चलो, इस विषय में हम शर्ते लगा लें । अपने पक्ष को सत्य सिद्ध करने में जो असफल होगा, उसे अपनी जीभ कटानी होगी ।" पहले शर्त मंजूर कर लो । तब हम दोनों में सहपाठी वसुराजा को प्रामाणिक मान कर इस विषय में उसके पास निर्णय लेने के लिए चलेंगे । उस सत्यवादी का निर्णय दोनों को मान्य करना होगा ।" 

नारद ने उस शर्त को और उस सम्बन्ध में वसु राजा द्वारा दिये हुए निर्णय को मानना स्वीकार किया, क्योंकि 'सांच को आंच नहीं ।' सत्य बोलने वाले को भय और क्षोभ नहीं होता । पर्वत की माता ने जब दोनों का विवाद और परस्पर शर्त लगाने की बात सुनी तो वह बहुत चिन्तित हुई और अपने पुत्र पर्वत को एकान्त में ले जा कर कहा– 'बेटा ! जब में घर का कार्य कर रही थी, तब तेरे पिता के मुंह से मैने 'अज' शब्द का अर्थ तीन साल पुराना धान्य ही सुना था । तूने जीभ कटाने की जो शर्त लगाई है, वह अहंकार और हठ से युक्त है ! यह काम तुने बहुत अनुचित किया है । बिना बिचारे कार्य करने वाला अनेक संकटो से घिर जाता है ।" पर्वत ने जरा सहमते हुए कहा – "माताजी ! अब तो में आवेश में आ कर जो कुछ कर चुका, वह कर चुका अब आप बताईये कि फैसला हमारे पक्ष में किसी सुरत से हो सके, ऐसा कोई उपाय है या नहीं ? पर्वत पर भविष्य में आने वाले भयंकर संकट की आशंका से पीडि़त व कांटे चुभने के समान व्यथित हृदय से माता सीधी वसुराजा के पास पहुंची । पुत्र के लिये क्या-क्या नहीं किया जाता ?

गुरुपत्नी को देखते ही वसुराजा ने प्रणाम करते हुए कहा – "माताजी ! आओ, पधारो ! आपको देने से ऐसे लगता है, मानो आज मुझे, साक्षात् गुरुश्री क्षीरकदम्बक के ही दर्शन हुए है । कहिए, मैं आपके लिये काय करुं ? कया दूं ?" तब ब्राह्मणी ने कहा– " पुथ्वीपति !  मुझे पुत्रभिक्षा चाहिए, केवल इसी एक चीज की जरुरत है, बेटा ! पुत्र के चले जाने पर धन-धान्य आदि दूसरे पदार्थो के होने न होने से क्या लाभ ?" वसु ने कहा – "माताजी ! पर्वत मेरे लिये पूज्य है उसकी सुरक्षा मुझे करनी चाहए ! श्रुति में कहा है – 'गुरु के पुत्र के साथ गुरु के समान बर्ताव करना चाहिए ।' अकाल में रोष करने वाले यमराज ने आज किसके नाम की चिट्ठी निकाली है ? माताजी ! मुझे बताओं कि मेरे बन्दु को कौन मारना चाहता है ? मेरे रहते आप क्यों चिन्ता करती है ?" तब पर्वत की माता ने कहा –' अज - शब्द के अर्थ पर पर्वत और नारद दोनों में विचार छिड़ गया । इस पर मेरे पुत्र पर्वत ने यह शरत् लगाई है कि यदि 'अज' का अर्थ बकरा न ही तो मैं जीभ कटाऊँगा और 'बकरा' हो तो तुम जीभ कटाना । इस विवाद के निर्णयकर्ता प्रमाणपुरुष के रुप में दोनों ने तुम्हे माना है । इसलिए में तुमसे प्रार्थना करने आई हूं कि अपने बन्धु की रक्षा करने हेतु 'अज' शब्द का अर्थ बकरा ही करना । महापुरुष तो प्राण देकर भी परोपकार करने वाले होते है तो फिर वाणी से तुम इतना-सा परोपकार नही करोेंगे ?" यह सुन कर वसुनृपने कहा– 'माताजी ! यह तो असत्य बोलना होगा । मैं असत्य वचन कैसे बोल सकता हूँ ? प्राणनाश की अवसर आने पर भी सत्यवादी असत्य नहीं बोलते। दूसरे लोग कुछ भी बोले, परन्तु पाप भीड़ को तो हर्गिज नहीं बोलना चाहिए और फिर गुरुवनच के विरुद्ध बोलना या झूठी साक्षी देना, यह बात भी मुझसे कैसे हो सकती है ?' पर्वत की माता में रोष में आ कर कहा – 'तो फिर दो रास्ते है तेरे सामने – यदि परोपकारी बनना है तो गुरुपुत्र की रक्षा करके उसका कल्याण करो और स्वार्थी ही रनहा है तो सत्यवाद का आग्रह रखो ।' इस प्रकार बहुत जोर देकर कहने पर वसुराजा ने उसका वचन मान्य किया और क्षीर कदम्बक की पत्नी हर्षित होकर घर चली आई ।

(ठीक समय पर बिढ़ान् नारद और पर्वत दोनों निर्णय के लिये वसुराजा की राजसभा में आए। सभा में दोनों वादियों के सत्य-असत्यरुप और नीरव्त भलीभांति विवेक करने वाले उज्जवल प्रभावान् माध्यस्थ गुण वाले सभ्य लोग एकत्रित हु । सभापति वसुराजा एक स्वच्छ स्फटिक शिळा की वेदिका पर स्थापित सिंहासन पर बैठ हुआ एसा सुशोभित हो रहा था, मानो पृथ्वी और आकाश के बीच में सूर्य हो । उसके बाद नारद और पर्वत ने वसुराजा ने सामने 'अज' शब्द पर अपनी-अपनी व्याख्या प्रस्तुत की औ कहा – 'राजन् ! हम दोनों के बीच आप निर्णायक है, आप इस शब्द का यथार्थ अर्त कहिए। क्योंकि ब्राह्मणों और वृद्धों ने कहा है–'स्वर्ग और पृथ्वी इन दोनों के बीच में जैसे सूर्य है, वैसे ही हम दोनों के बीच में आप मध्यस्थ है ; दोनों के विवावद में निर्णायक हूं । अब आप यह प्रमाणभूत है । आपका जो निर्णय होगा वही हम दोनों को मान्य होगा ।

सत्य या शपथ के लिेय हाथ में उठाया जाने वाला गर्मागर्म दिव्य घट या लोहे का गोला वास्तव में सत्य के कारण स्थिर रहता है । सत्य पर ही पृथ्वी आधारित है, द्युलोक भी सत्य पर प्रतिष्ठित है। सत्य से हवा चलती है । सत्य से देव वश में हो जाते है । सत्य से ही पुष्टि होती है । सारा व्यवहार सत्य पर टिका है । आप दूसरे लोगों क सत्य पर टिकाते है तो आपको इस विषय में क्या कहना ? सत्यव्रत के लिेय जो उचित हो, वही निर्णय दो ।" वसुराजा ने मानी सत्य के सम्बन्ध में उक्त बातें सुनी-अनसुनी करके किसी प्रकार का दीर्घदृष्टि से विचार न करते हुए कहा, 'गुरुजी ने अज्ञान-मेषान् अर्थात् अज का अर्थ बकरा किया था' । इस प्रकार का असत्य वचन बोलते ही वेदिकाषिष्ठित देवता कोपायमान हुए । उन्होंने आकाश जैसी निर्ल स्फटिकशिलामयी वेदिका एवं उस पर स्थापित सिंहासन दोनों को चूरचूर कर दिया । वसुराज को तत्काल भूतल पर गिरा दिया, मानों उन्होंने उसे नरक में गिराने का उपक्रम किया हो । नारद भी तत्काल भी वह कर तिरस्कार करता हुआ वहां से चल दिया कि चाण्डाल के समान झूठी साक्षी देने वाले तेरा मुंह कौन रखे ? असत्य वचन बोलने से देवताओं द्वारा अपमानित वसुराजा और पर्वत नरक में गयें । अपराधी वसुराजा का जो भी पुत्र राजगद्दी पर बैठता, देवता उसे मार गिराते थे । इस तर वसु के आठ